मैं ही कश्ती हूँ, मुझीं में है समंदर मेरा
निदा फ़ाज़ली का शेर हैहर घड़ी खुद से उलझना है मुकद्दर मेरामैं ही कश्ती हूँ, मुझीं में है समंदर मेराबस कुछ ऐसे ही हाल है, इन दिनों.... ऊब के साथ अरूचि का संयोग है, न सूफी पसंद आ रहा है, न गज़लें, न शास्त्रीय.... न फिक्शन भा रहा है, न फैक्चुअल... न फिलॉसफी...
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डॉ. अमिता नीरव
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[19 Apr 2010 01:26 AM]



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