यूँ बस्तों का बोझ बढ़ाना, ठीक नहीं
सब को अपना हाल सुनाना, ठीक नहीं औरों के यूँ दर्द जगाना, ठीक नहींहम आँखों की भाषा भी पढ़ लेते हैं हमको बच्चों सा फुसलाना, ठीक नहींये चिंगारी दावानल बन सकती हैगर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं बातों से जो मसले हल हो सकते हैंउनके कारण बम बरसाना, ठीक...
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नीरज गोस्वामी
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[19 Apr 2010 00:30 AM]



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