रात की आँखें बेहद नम थीं
रात की आँखें बेहद नम थीं।वो भी शायद शामिले-ग़म थीं ॥सूरज कुछ ज़र्दी माएल था,किरनों की पेशानियाँ ख़म थीं॥दरिया की तूफ़ानी लहरें,तल्ख़िए-साहिल से बरहम थीं॥सुस्त पड़ी थीं तेज़ हवाएं,बून्दें बारिश की मद्धम थीं॥ फूल सभी मुरझाए हुए थे, तितलियां सब मह्वे-मातम...
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युग-विमर्श
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[18 Apr 2010 23:08 PM]



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