चांद किरन से की मनुहारें
कलासाधिके तेरे नयनों से फिसली इक दॄष्टि किरन नमेरे मन के अवसादों में भर दी है उमंग फ़ागुन कीअंबर ने भर कलश तिमिर के जितने ढुलकाये संध्या मेंउनका तम रिस रिस कर रंगता था मेरे मन की दीवारेआशा के जुगनू करवट ले लेकर उनमें रह जाते थेतोड़ा करती थी दम पल पल चांद...
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राकेश खंडेलवाल
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[18 Apr 2010 21:51 PM]



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