इलाज की नई, ‘विकट पद्धति’
‘विकटजी’ कुपित हैं। नहीं। कुपित कम और क्षुब्ध अधिक। झुँझलाहट से उबले जा रहे हैं। उनके साथ ‘यह सब’ करनेवाले दोनों लोगों का ‘किंचित मात्र भी’ नहीं बिगाड़ पाने की झुंझलाहट से। क्रुद्ध, बिगड़ैल साँड की तरह फूँ-फूँ करते हुए कभी मोहल्ले की चाय की गुमटी पर बैठ...
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विष्णु बैरागी
जीवन का इन्द्रधनुष
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[18 Apr 2010 20:30 PM]



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