....गांव की कुछ यादें

अपनी बात... आज अजय कुमार झा जी की पोस्ट पढ़ रही थी, पढ़ते-पढ़ते अपना गाँव बहुत-बहुत याद आने लगा.हमारा गाँव इसलिए क्योंकि वहां हमारे दादा-परदादा रहे. पुश्तैनी मकान, ज़मीन सब वहीं है. ये अलग बात है, कि हमें गाँव में रहने का मौका केवल छुट्टियों में मिलता था, वो भी तब... [पूरी पोस्ट]
writer वन्दना अवस्थी दुबे

संस्मरण

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[18 Apr 2010 14:58 PM]

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