अब सिर्फ़ चिट्ठा नहीं , अब चिट्ठी भी...................

kuch bhi kabhi bhi आज जाने इस गर्मी में क्या सूझा कि खोल कर बैठ गए अपने एक पुराने संदूक को , बहाना तो था साफ़ सफ़ाई का । उस संदूक पर पडी हुई धूल की पर्त मुझे कई दिनों से चुभ रही थी ,मगर उससे ज्यादा लालच इस बात का था कि रोज के दर्जन भर अखबारों और बहुत सारी पत्र पत्रिकाओं को... [पूरी पोस्ट]
writer अजय कुमार झा
views
60
upvote
5
downvote
0
rating
5
comments
18
[18 Apr 2010 14:35 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix