मनोज कुमार झा की कविताएँ - दूसरी किस्त
मुझे बस उत्सव में शामिल कर लो तस्वीर और वक्तव्य प्रतिलिपि से साभार बाँसक ओधि उखाड़ि करै छी जारनिहमर दिन नहि घुरतकि हे जगतारिनि(नागार्जुन, पत्रहीन नग्न गाछ, १९६८)(बाँस की जड़ें खोदकर लाता और मात्र वही जलावन, ऐ जगतारनी क्या मेरे दिन नहीं फिरेंगे?)एक स्त्री...
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शिरीष कुमार मौर्य
श्रेष्ठ हिंदी कविता
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[18 Apr 2010 11:45 AM]



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