shiv

zindggii मेरी आँखों में नचाता था तू ही ख्वाबों को बाँध के गंगा की धारा से बने धागों से ....इस ओर,उस ओर,मगर मेरी ही ओर, उड़ती रहती थीं तितलियाँ तेरी नज़रों की अपने पंखों पेरंगीन सी हंसी रखे... मेरी धड़कन पे तू अपनी जटा फैला कर कैसे सुनता था झिलमिलाती इनकी बातें ॥... [पूरी पोस्ट]
writer aanch
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[18 Apr 2010 03:20 AM]

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