मृग-नयनी
सूनी गलियों में उनका आनाकुछ ऐसा लगता हैज्यों बदन तपाती गर्मी मेंशीत हवाओं का सहलानाहिम सी सुंदर उसकी छवि मेंथोड़ी गर्माहट घुल जानामृग-नयनी सी जंगल में वोहै ढूंढ रही कस्तूरी कोनहीं जानती, वो नादां हैवो खुशबू उसमें ही हैमोम सी नाजुक वो गुड़िया हैमखमल के...
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anupam mishra
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[18 Apr 2010 09:06 AM]



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