व्यंग्य कविता - स्टे

virendra jain ke nashtar व्यंग्य कविता स्टे_____ वीरेन्द्र जैन् एक साधु ने अपने स्वार्थ हेतुएक सेठ को बरगलायाऔर उसे नारकीय पीड़ा कादिल दहला देने वालालगभग आंखों देखा हाल सुनाया।बोला, -रे अधम,जब यम के दूततुझ लेने आयेंगेतो तेरे ये सारे ठाट बाटधरे के धरे रह जायेंगेलेकिन सेठ बिल्कुल... [पूरी पोस्ट]
writer वीरेन्द्र जैन

न्याय व्यवस्था

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[18 Apr 2010 01:52 AM]

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