वर्धा में पूरा होता गान्धी का एक सपना…
आप जानते ही होंगे कि सरकारी कोषागार कार्यालय वित्तीय वर्ष की समाप्ति करीब आने पर अत्यधिक व्यस्त हो जाते हैं। इस बार भी स्थिति बदली नहीं थी। पन्द्रह मार्च के बाद ही ऑफिस में कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ रही थी। घर आकर ब्लॉगरी करने की हिम्मत नहीं पड़ती।...
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सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
विभूति नारायण राय
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[17 Apr 2010 23:29 PM]



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