भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 5

एक आलसी का चिठ्ठा पहला भागदूसरा भागतीसरा भाग चौथा भाग  ... मन में कचोट और वाणी पर उसे दबाती प्रगल्भता। भारी कदमों से मैं अपने जन्मस्थान से वापस होता हूँ। जाने फिर कब आना हो? जाने क्या रूप देखने को मिले? लेकिन यह स्थान तो चिर जीवित रहेगा... क्या बस मेरी साँसों के... [पूरी पोस्ट]
writer गिरिजेश राव
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[17 Apr 2010 22:15 PM]

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