ऊब से सुलह....
दिनचर्या को खगालने लगा। पड़े-पड़े घर में विचरण.. और क्या कह सकता हूँ इसे मैं? घर के मेरे कई ठिये बन गए हैं, (यूं एक कमरे के घर में बहुत गुंजाइश नहीं होती।) यह विचारबद्ध तय नहीं हुए... यह रहते-रहते आदतन और आलस्य की खिचड़ी से पक के तैयार हुए हैं। सुबह मुझे...
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मानव
किस्सा...
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[17 Apr 2010 16:16 PM]



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