झड़ की टोकरी
मन को झिंझोड़कर हम भी कवि हो गए ,ढूंढ़कर प्रकाशकण हम भी रवि हो गए ।तोड़ कर रख दिया शब्द के दंभ को ,जोड़ कर रख दिया उस स्वप्न छिन्न को ,मोड़ कर रख दिया भय की तरंग को ,मारकर एक कलंक हम शिकारी हो गए ।काट कर रख दिया टूट चुके तान को ,छाँट कर रख दिया नम रेत से...
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राजेन्द्र मीणा
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[15 Apr 2010 06:18 AM]



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