रात की हलचल

अधूरा सपना “कोई सीमा होती है, किताबों में घुसे रहने की………” चलो मस्ती कर आते हैं सभी ने अपना सिर खुजलाते हुए कहा, और हम अपनी लाइब्रेरी से बाहर निकल पड़े…… और इसके बाद शुरु हुआ मस्ती का दौर…… कुछ तो सो रहे कुत्तों को कुत्तों जैसी आवाज निकालकर उन्हें कन्फ्यूज़ करने लगे,... [पूरी पोस्ट]
writer Manish
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[17 Apr 2010 12:35 PM]

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