छत्तीसगढ़ी में दोहा: --संजीव 'सलिल'
छत्तीसगढ़ी में दोहा: --संजीव 'सलिल' हमर देस के गाँव मा, सुन्हा सुरुज विहान.अरघ देहे बद अंजुरी, रीती रोय किसान..जिनगानी के समंदर, गाँव-गँवई के रीत. जिनगी गुजरत हे 'सलिल', कुरिया-कुंदरा मीत..महतारी भुइयाँ असल, बंदत हौं दिन-रात.दाई! पैयाँ...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
samyik hindi kavita
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[17 Apr 2010 01:23 AM]



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