क्यों जाने दिया उसे?
रतन1कोलाहल का तांडवखंडित है नीरवभीड़ चहुंओरभागा-भागी का दौरसब हैं अपने काम में मगनफुरसत नहीं किसी कोपल भर कीसुबह हुई शाम हुईजिंदगी रोज तमाम हुई2जहां थी कोलाहल की आंधीसब कुछ पड़ा है आज मंदखामोश दरो-दीवारेंबे-आवाज जंजीरेंन घुंघरू की छम छमन तबले की थापन...
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इष्ट देव सांकृत्यायन
कविता
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[16 Apr 2010 21:05 PM]



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