विरह गीत- दीप बना कर याद तुम्हारी
दीप बना कर याद तुम्हारी, प्रिय, मैं लौ बन कर जलती हूँप्रेम-थाल में प्राण सजा कर लो तुमको अर्पण करती हूँ।अकस्मात ही जीवन मरुथल में पानी की धार बने तुम,पतझड़ की ऋतु में जैसे फिर जीवन का आधार बने तुम,दो दिन की इस अमृत वर्षा में भीगे क्षण हृदय बाँध कर,आँसू से...
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मानसी
poetry
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[16 Apr 2010 19:47 PM]



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