टुकड़े-टुकड़े सुबह हुई था होश कहाँ

युग-विमर्श  (YUG -VIMARSH)   یگ ومرش टुकड़े-टुकड़े सुबह हुई था होश कहाँ।दामन में थी आग लगी था होश कहाँ॥उसके दर पर सज्दा करने आया था,पेशानी फिर उठ न सकी था होश कहाँ॥वो आमाल तलब कर बैठा बेमौक़ा,फ़र्द थी बिल्कुल ही सादी था होश कहाँ॥दिल के दाग़ नुमायँ हो कर बोल उठे, बरत न पाया ख़ामोशी था होश... [पूरी पोस्ट]
writer युग-विमर्श
views
12
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
4
[16 Apr 2010 09:09 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix