टुकड़े-टुकड़े सुबह हुई था होश कहाँ
टुकड़े-टुकड़े सुबह हुई था होश कहाँ।दामन में थी आग लगी था होश कहाँ॥उसके दर पर सज्दा करने आया था,पेशानी फिर उठ न सकी था होश कहाँ॥वो आमाल तलब कर बैठा बेमौक़ा,फ़र्द थी बिल्कुल ही सादी था होश कहाँ॥दिल के दाग़ नुमायँ हो कर बोल उठे, बरत न पाया ख़ामोशी था होश...
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युग-विमर्श
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[16 Apr 2010 09:09 AM]



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