चिठ्ठियाँ और ई - मेल.....

अधूरा सपना एक वह दौर था, जब बम्बई से मौसी जी की चिठ्ठियाँ आया करती थीं, और हम लोग नानी जी के उस बड़े आम के बागीचे के किसी घने पेड़ की छाँव में बैठकर चिठ्ठियाँ पढ़कर नानी जी को सुनाया करते थे. ज्यादातर चिठ्ठियाँ दीदी ही पढ़कर सुनाया करती थीं और पढ़ते पढ़ते नानी के... [पूरी पोस्ट]
writer Manish
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[16 Apr 2010 08:10 AM]

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