गुलजारगी...आवारगी...हर कुछ मेरे गुलजार में
जब कोई पूछता है कि गुलजार तुम्हें क्यों पसंद है तो मैं जवाब देने के लिए पल भी नहीं सोचता, बस कह देता हूं- गुलजार हमारी भाषा बोलते हैं। मेरे लबों पर तुंरत उनकी यह त्रिवेणी आ जाती है- आओ सारे पहन लें आईने.. सारे देखेंगे अपना ही चेहरा..सबको सारे हंसी लगेंगे...
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गिरीन्द्र नाथ झा
गुलजारनामा
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[16 Apr 2010 05:24 AM]



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