एक अनंत से दूसरे अनंत तक: अनामिका की कविताएं - कुमार मुकुल

कारवाँ अनामिका की कविताएँ औसत भारतीय स्त्री जीवन की डबडबाई अभिव्यक्तियाँ हैं-‘‘मैं उनको रोज झाड़ती हूँ-पर वे ही हैं इस पूरे घर में जो मुझको कभी नहीं झाड़ते!’’‘फर्नीचर’ कविता की ये पंक्तियाँ आधी आबाद के गहन दुख को उसकी सांद्रता के साथ जिस तरह अभिव्यक्त करती हैं वह... [पूरी पोस्ट]
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[16 Apr 2010 05:09 AM]

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