संवेगों को लगाम दो!
क्यों भटक रही है?ये नयी पीढ़ी,न जमीं का अहसास न आसमां का अंदाज पैरों के तले जमीं का अंदाज जो देखा खिसकी नहीं है,बस खिसकने के अंदेशे में खुद को कत्ल कर लिया.अभी कितना जीना था?किसके लिए जीना था?कुछ भी नहीं सोचा,कितने बेसहारे छूटे...
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रेखा श्रीवास्तव
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[16 Apr 2010 04:23 AM]



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