कवी महोदय तो अब आते नहीं लगता है वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के चक्कर में कुछ खाते नहीं......
एक दिन शौचालय भी हंस कर बोल पड़ामैं तो एक हूँ पर लोग क्यों अनेक हैं किसी का मोटा, किसी का पतला कोई गोरा तो कोई काला................ सब अपनी तशरीफ़ रखते हैं खुद तो पकवान खाते हैं मुझे सडा-गला बचा हुआ खिलाते हैं हर दिन कुछ नया मिलता...
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Tej Pratap Singh
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[15 Apr 2010 15:33 PM]



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