॥ आगे नहीं, पीछे नहीं॥

जनपद (मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : छह)हे सखी, अगर जंगल में लकड़ी लाने जानातो कभी आगे मत रहना!हे बहन, अगर जंगल में पत्ते चुनने जानातो कभी पीछे नहीं रहना!इस जमाने मेंबदसूरत कुल्हाड़ी ही शेर बन गई है,कभी आगे नहीं रहना!मुडे. हुए पत्ते हीआजकल सांप बन गए हैं,कभी... [पूरी पोस्ट]
writer अरविन्द चतुर्वेद
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[15 Apr 2010 11:19 AM]

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