के है कोई सबेरा
है कोई तो पहलू अँधेराके जिसकी तह में है कोई तो चेहराचलना है आँख मूँद करवरना क्या वक़्त है कभी ठहरासाये सा उभरता है वोतन्हाँ देखते ही लगता है पहराजुबाँ उसकी ही तो बोलते हैंजड़ों में बस गया है जो गहरारौशनी करते हैं सायों पे बार बारउघाड़ते हैं दिन-रात , के है...
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शारदा अरोरा
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[15 Apr 2010 05:39 AM]



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