प्राणघातक प्रण मेरा
तोड़ तो बंधनों को, अब जरा उनमुक्त रहो,छोड़कर दुनिया को अब जरा आजाद रहो,हरबार सोचकर, एकबार ये फैसला आज करो,बहुत हुआ संगी-साथी,सब साथ छुट जाते हैं, एकबार भावनाओं को शब्दों के समंदर से,जरा निकाल कर उतार फेंको,बहुत हुआ स्नेह-निमंत्रण,अब तो हो कुछ ऐसा भी,हर...
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चन्दन कुमार
साहित्य
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[15 Apr 2010 03:33 AM]



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