बचपन : एक

कस्बे का कवि... जहाँ-जहाँ भी रहेकिराये के मकानों मेंवहाँ-वहाँ छूटता गयाघर के कबाड़ के साथ-साथकुछ न कुछ महत्वपूर्णकुछ यादें, कुछ लोगकुछ बचपनसब पीछे छूट गयाअब तो सिर्फज़रूरी सामान ही बचा हैघर के मकान में.... [पूरी पोस्ट]
writer मणिमोहन
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[14 Apr 2010 23:15 PM]

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