सूखती नदियाँ और उदासी
दिन ऊबर-खाबड़ थेऔर रास्ते में जो नदियाँ मिलती थींउनका पानी नीचे उतर गया होता थाबारिश पे चील-कौए मंडराते थे ईश्वर को कोसती थी एक बूढी औरत गीली हवा के इंतज़ार मेंरातों का अँधेरा टूट जाता थाऔर रातें सुबह तक बिखरी हुई मिलती थींया रस्सी से लटकी हुईंख्वाब से...
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ओम आर्य
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[14 Apr 2010 22:20 PM]



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