प्रणय का संभार कैसा !

Unmanaa हो तुम्हीं यदि दूर तो यह प्रणय का सम्भार कैसा ! तुम लगा पाये न मेरे दु:ख का अनुमान साथी, जान कर भी अब बने जो आज यों अनजान साथी,है निराशा की धधकती आग एक महान साथी, हो चुके हैं भस्म जिसमें छलकते अरमान साथी,प्राण शीतल प्रेम में यह विरह का श्रृंगार कैसा ! हो... [पूरी पोस्ट]
writer Sadhana Vaid
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[14 Apr 2010 21:52 PM]

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