सागर तट पर
सागर तट पर खड़ी खड़ी निहार रही थी मैं उसकी अथाह गहराई और उफ़नाती लहरों को जो बीच बीच में मेरे कदमों को चूम कर वापस जाती फ़िर लौट आती मानों आपस में उनमें होड़ लगी हो। सागर की सतह पर पड़ता सूर्य का प्रतिबिंब अपनी अलग ही छटा बिखेर रहा था मानो वो चांदी की एक...
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JHAROKHA
कविता
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[14 Apr 2010 13:26 PM]



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