॥ रोज रोज की गरीबी॥
(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : पांच)रोज रोज की गरीबी कहो या नींद का मरणमैं कबतक और कितनी इसकी चिंता में रहूं!रोज रोज की झंझट कहो या जी का जंजालकितनी बार ओझा के दरवाजे दौड़ लगाऊं।ओह, कबतक इन सबकी चिंता में जलूं?घर की सारी भेड़-बकरियांबेच-खाकर खत्म हो गईं...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[14 Apr 2010 12:09 PM]



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