॥ रोज रोज की गरीबी॥

जनपद (मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : पांच)रोज रोज की गरीबी कहो या नींद का मरणमैं कबतक और कितनी इसकी चिंता में रहूं!रोज रोज की झंझट कहो या जी का जंजालकितनी बार ओझा के दरवाजे दौड़ लगाऊं।ओह, कबतक इन सबकी चिंता में जलूं?घर की सारी भेड़-बकरियांबेच-खाकर खत्म हो गईं... [पूरी पोस्ट]
writer अरविन्द चतुर्वेद
views
8
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
1
[14 Apr 2010 12:09 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix