फ़िज़ा में आइनों के अक्स जब दम तोड़ देते हैं
फ़िज़ा में आइनों के अक्स जब दम तोड़ देते हैं।रुपहले ख़्वाब सब थक हार कर हम तोड़ देते हैं॥ लिए मजबूरियाँ हम दर-ब-दर फिरते हैं बस्ती में,कभी ज़ख़्मों की सौग़ातें कभी ग़म तोड़ देते हैं॥लबालब मय न हो तो लुत्फ़ पीने का नहीं आता, वो साग़र जिसमें हो मेक़दार कुछ...
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ग़ज़ल / फ़िज़ा में आइनों के
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[14 Apr 2010 11:05 AM]



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