खामोश! मैं महगाई हूँ भाई...
चरण कमल बंदौ हरिराई, आंख खुली तो पाई मंहगाई। जैसे ही यह गीत पुरुषोत्तम महाराज ने स्टेज से गाया, पूरे हॉल में तालियों की गडग़ड़ाहट फैल गयी। ऐसा लगा मानों मंहगाई का पुर्नजन्म हो गया। सभी श्रोतागण मंहगाई के पुर्नस्थापित होने पर गौरवान्वित हो रहे थे। क्योंकि...
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मनोज द्विवेदी
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[14 Apr 2010 08:54 AM]



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