कविता
धूप की तरह आओमेरे घर मेंपानी की तरहचू जाओ कहीं से भीहवा की तरहदरवाज़ा खटखटा कर आओपीले पत्तों की तरहभरा जाओ घर मेंसपने की तरह चली आओदबे पाँव नींद मेंदुःख की तरह आओकभी न जाने के लिएया खुशी की तरहधमक जाओ अचानकदिन भर के काम से निबट कररातजिस तरह आती है...
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मणिमोहन
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[14 Apr 2010 04:46 AM]



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