क़ैद
ज़हन और दिल पेतेरी यादों के सायेइस क़दर छाये हैजैसेपहाड़ी कंदराओं केआखिरी हिस्से मेंछाया हुआ अँधेरावक़्त भी खड़ा हैपाएदार की तरहएक ही जगह परना सहर होती हैना शाम ढलती हैउम्मीद की किरण भी दो कदम चलकरदम तोड़ देती हैलगता है ये रूहजिस्म से आज़ाद होकर भीजन्मों...
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निर्झर'नीर
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[14 Apr 2010 02:39 AM]



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