भर्तृहरि नीति शतक-धन कि उष्मा से मनुष्य की प्रतिष्ठा बढ़ती है (Dhan aur pratishtha-hindi sandesh)
तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिप्रतिहता वचनं तदेव। अर्थोष्मणा विरहितः पुरुष क्षणेन सोऽप्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।। हिन्दी में भावार्थ-एक जैसी इंद्रियां, एक जैसा नाम और काम, एक ही जैसी बुद्धि और वाणी पर फिर भी जब आदमी धन की गरमी से क्षण भर...
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दीपक भारतदीप
आध्यात्म
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[14 Apr 2010 00:14 AM]



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