कबीर के दोहे-दुष्टों कि निंदा कि बजाय साधुओं के प्रशंसा में वक्त बिताएं (kabir ke dohe-ninda aur prashansa)
काहू को नहिं निन्दिये, चाहै जैसा होय।फिर फिर ताको बन्दिये, साधु लच्छ है सोय।।संत कबीरदास का कहना है कि चाहे व्यक्ति अच्छा हो या बुरा उसकी निंदा न करिये। इसमें समय नष्ट करने की बजाय उस आदमी की बार बार प्रशंसा करिये जिसके लक्षण साधुओं की तरह हों।सातो सागर...
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दीपक भारतदीप
हिन्दू-धर्म
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[13 Apr 2010 23:42 PM]



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