हो चुकी हैं राख जलकर बस्तियाँ ऐसी भी हैं

युग-विमर्श  (YUG -VIMARSH)   یگ ومرش हो चुकी हैं राख जलकर बस्तियाँ ऐसी भी हैं।आँखें कर देती हैं नम महरूमियाँ ऐसी भी हैं॥झीने आँचल में समेटें धूप ये मुम्किन नहीं,बर्फ़ सी चुभती हैं दिल में बदलियाँ ऐसी भी हैं॥अब तो बाग़ीचे में कोई फूल खिलता ही नहीं,नाउमीदी की ख़िज़ाँ-अँगड़ाइयाँ ऐसी भी... [पूरी पोस्ट]
writer युग-विमर्श

ग़ज़ल / हो चुकी हैं राख

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[13 Apr 2010 23:10 PM]

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