राही
मुझको सूरज की किरण दे दो,आकाश का नीला विस्तार दे दो,मैं हूँ एक पाखी,जीने के लिए ऊँची उड़ान दे दो.मैं अपने कोमल पँखों को फ़ैलाऊँगीबादलों के साथ बहुत दूर तक जाऊँगीकोई साथी नहीं होगा,इस सफ़र के अनंत बिंदु तक जाऊँगी.पेड़ के नीचे ठंडी हवा जब बहेगीपलकें बोझिल हो...
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रजनी भार्गव
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[13 Apr 2010 23:06 PM]



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