कुछ बात यूं हई
तुझे जब-जब लिखना चाहा...कुछ बात यूं हुई...हम खींचते रहे स्केच...औऱ ...बात... चली गई ...तुझे जब-जब कहना चाहा...कुछ बात यूं हुई...तेरी बात कहते-सुनते...हर राह गुजर गई...तुझे जब-जब पढ़ना चाहा...कुछ बात यूं हुई...हर पन्ने की आखिरी लाइन पर...तू कहीं ठिठक...
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हेमन्त वशिष्ठ
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[13 Apr 2010 17:42 PM]



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