सिन्दूर की अभी भी है कमी............

साहित्य योग उँगलियों से टटोलती मांग को अपने सर पर रखकर हाथ सोंचती  सिन्दूर की अभी भी है कमी....निहारती दर्पण को एक टक फिर रो पड़ती सहसा.....धूमिल हो जाते सपने आँखों से गिरते बूंदों के बदल से.....कोई ना आया पकड़ने उसका हाथ और ना ही पोंछा आसुओं भरी... [पूरी पोस्ट]
writer Tej Pratap Singh
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[13 Apr 2010 16:32 PM]

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