तेरी प्रतिमा
बहुत दिनों से रागमयी कोई रचना नहीं की। दिमाग भी ऐसा है कि जिसमें मज़ा आता है वही करता रह जाता है, आलेख या समीक्षायें लिखने में रमा तो लिखता ही रहा, बगैर यह सोचे कि उनके पाठक ज्यादा नहीं, सीधी, सपाट कवितायें की तो बस करता ही चला गया, बगैर यह सोचे कि उसके...
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अमिताभ श्रीवास्तव
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[13 Apr 2010 15:58 PM]



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