॥ अयोध्या सुलग रही है॥
(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : चार)हे राम-लक्ष्मणदेखिए, लंका जल रही है!हे सीता ठकुरानीदेखिए, अयोध्या सुलग रही है!किसने आग लगाईलंका धधक रही है?किसने फेंकी चिनगारीअयोध्या सुलग रही है?धांगर ने लगाई आगलंका धधक रही हैमायावी की चिनगारी सेदेखो, अयोध्या सुलग रही...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[13 Apr 2010 11:34 AM]



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