रण बांकुरा
पहले पहल घबराता था हृदयजीवन की कठिनाइयों सेसहमी सहमी सी मैं डर जाती थीकभी कभी अपनी ही परछाइयों सेलगता था जीवन पथ मुश्किलमैं पार नहीं कर पाऊंगीमन के इस भय रूपी दानव परकभी मैं वार नहीं कर पाऊंगीयह भय बन कर दरियामुझे डुबाता चला गयाजब कुछ सूझा ना मैं कैसेइस...
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Shikha Deepak
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[13 Apr 2010 10:11 AM]



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