लाश

amitraghat जबकि दोपहर बेहद दिलचस्प है..........। और हम हस्बे मामूल* डर रहे हैं लाश से खासतौर पर जब हमने खुद अपने हाथों से मारा हो..........” हमें लगता है कि वह मुरदा कहीं आँखें न खोल ले लिहाज़ा कई घण्टों तक हाथ में चाकू लिये या कुछ भी उसका इंतज़ार करते हैं, कि कब... [पूरी पोस्ट]
writer Amitraghat
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[13 Apr 2010 09:59 AM]

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