रंग-रँगीला : कृष्णकुमार यादव की एक बालकविता
रंग-रँगीला
गाल गुलाबी, नाक नुकीली, लंबी टोपी पहन चिढ़ाए। उछले-कूदे, चले मटककर, पहिए पर चढ़ उसे चलाए। रंग-रँगीला बनकर आए, सबके मन को ख़ुश कर जाए। हम सब देख बजाते ताली, जोकर सबको ख़ूब हँसाए। झूला झूले चहक-चहककर, चढ़े सायकिल, तो लहराए। कितना अच्छा है यह...
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रावेंद्रकुमार रवि
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[13 Apr 2010 09:57 AM]



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