प्रतीक्षा
ताजे नए हरे पत्तों में , ,,खूब मल कर मुंह धोयी और भी चटकार गोरी हो ली जैसे ................छोटे सफेद गमकते फूलों की लड़ियों से गढ़ी नीक नीक , ढेर -सी चांदी की बाली ,,,,,,,,,और अब अंग अंग धारे बैठी है जोहती बाट पहली मद्धिम बरसात की ! ! ! मै तो निरखूं...
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Aarjav
कविता
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[13 Apr 2010 02:51 AM]



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