सविता
पिये! तुम गरमी में ना आओ. जहाँ पर रहती हो, रह जाओ.ताप से मैं आकुल-व्याकुल ह्रदय-खग करता है कुल-कुल पिकानद साथ रहो मिलजुल आपका रूप बड़ा मंजुल उसी को मेरे लिए सजाओ.जहाँ पर रहती हो, रह जाओ.आपके मौन शब्द मुझसे न जाने कितने ही अतिशय बात कह जाते थे रसमय पिये!...
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PRATUL
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[13 Apr 2010 00:31 AM]



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